आधार
सा
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गर्मियो के दिन थे, ताल-तलैया सूखी पडी थी।
जोरों की लू चलने लगी थी। गॉँव में कहीं से एक सांड आ निकला और गउओं के साथ हो
लिया। सारे दिन गउओं के साथ रहता, रात को बस्ती में घुस आता और खूंटो से बंधे बैलो
को सींगों से मारता। कभी-किसी की गीली दीवार को सींगो से खोद डालता, घर का कूडा
सींगो से उडाता। कई किसानो ने साग-भाजी लगा रखी थी, सारे दिन सींचते-सींचते मरते
थे। यह सांड रात को उन हरे-भरे खेतों में पहुंच जाता और खेत का खेत तबाह कर देता ।
लोग उसे डंडों से मारते, गॉँव के बाहर भगा आते, लेकिन जरा देर में गायों में पहुंच
जाता। किसी की अक्ल काम न करती थी कि इस संकट को कैसे टाला जाय। मथुरा का घर गांव
के बीच मे था, इसलिए उसके खेतो को सांड से कोई हानि न पहुंचती थी। गांव में उपद्रव मचा हुआ था और मथुरा को
जरा भी चिन्ता न थी।
आखिर जब धैर्य का अंतिम बंधन टूट गया तो एक
दिन लोगों ने जाकर मथुरा को घेरा और बौले—भाई, कहो तो गांव में
रहें, कहीं तो निकल जाएं । जब खेती ही न बचेगी तो रहकर क्या करेगें .? तुम्हारी
गायों के पीछे हमारा सत्यानाश हुआ जाता है, और तुम अपने रंग में मस्त हो। अगर भगवान
ने तुम्हें बल दिया है तो इससे दूसरो की रक्षा करनी चाहिए, यह नही कि सबको पीस कर
पी जाओ । सांड तुम्हारी गायों के कारण आता है और उसे भगाना तुम्हारा काम है ; लेकिन तुम कानो में तेल डाले बैठे हो,
मानो तुमसे कुछ मतलब ही नही।
मथुरा को उनकी दशा पर दया आयी। बलवान मनुष्य
प्राय: दयालु होता है। बोला—अच्छा जाओ, हम आज
सांड को भगा देंगे।
एक आदमी ने कहा—दूर तक भगाना, नही तो फिर लोट आयेगा।
मथुरा ने कंधे पर लाठी रखते हुए उत्तर दिया—अब लौटकर न आयेगा।
चि
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अ
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लेकिन दस की पांच पग चला होगा कि पेट में
मीठा-मीठा दर्द होने लगा। उसने सोचा, दौड कर पानी पीने से ऐसा दर्द अकसर हो जाता
है, जरा देर में दूर हो जाएगा। लेकिन दर्द बढने लगा और मथुरा का आगे जाना कठिन हो
गया। वह एक पेड के नीचे बैठ गया और दर्द से बैचेन होकर जमीन पर लोटने लगा। कभी पेट
को दबाता, कभी खडा हो जाता कभी बैठ जाता, पर दर्द बढता ही जाता था। अन्त में उसने
जोर-जोर से कराहना और रोना शुरू किया; पर वहां कौन बैठा था
जो, उसकी खबर लेता। दूर तक कोई गांव नही, न आदमी न आदमजात। बेचारा दोपहरी के
सन्नाटे में तडप-तडप कर मर गया। हम कडे से कडा घाव सह सकते है लेकिन जरा सा-भी
व्यतिक्रम नही सह सकते। वही देव का सा जवान जो कोसो तक सांड को भगाता चला आया था,
तत्वों के विरोध का एक वार भी न सह सका। कौन जानता था कि यह दौड उसके लिए मौत की
दौड होगी ! कौन जानता था कि मौत
ही सांड का रूप धरकर उसे यों नचा रही है। कौरन जानता था कि जल जिसके बिना उसके
प्राण ओठों पर आ रहे थे, उसके लिए विष का काम करेगा।
संध्या समय उसके घरवाले उसे ढूंढते हुए आये।
देखा तो वह अनंत विश्राम में मग्न था।
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अब तो घर में खलबली मची। इधर कहा गया, हम
विदा न करेगें । भाई ने कहा, हम बिना विदा कराये मानेंगे नही। गांव के आदमी जमा हो
गये, पंचायत होने लगी। यह निश्चय हुआ कि अनूपा पर छोड दिया जाय, जी चाहे रहे। यहां
वालो को विश्वास था कि अनूपा इतनी जल्द दूसरा घर करने को राजी न होगी, दो-चार बार
ऐसा कह भी चुकी थी। लेकिन उस वक्त जो पूछा गया तो वह जाने को तैयार थी। आखिर उसकी
विदाई का सामान होने लगा। डोली आ गई। गांव-भर की स्त्रिया उसे देखने आयीं। अनूपा
उठ कर अपनी सांस के पैरो में गिर पडी और हाथ जोडकर बोली—अम्मा, कहा-सुनाद माफ करना। जी में तो
था कि इसी घर में पडी रहूं, पर भगवान को मंजूर नही है।
यह कहते-कहते उसकी जबान बन्द हो गई।
सास करूणा से विहृवल हो उठी। बोली—बेटी, जहां जाओं वहां सुखी रहो। हमारे
भाग्य ही फूट गये नही तो क्यों तुम्हें इस घर से जाना पडता। भगवान का दिया और सब
कुछ है, पर उन्होने जो नही दिया उसमें अपना क्या बस ; बस आज तुम्हारा देवर सयाना होता तो
बिगडी बात बन जाती। तुम्हारे मन में बैठे तो इसी को अपना समझो : पालो-पोसो बडा हो
जायेगा तो सगाई कर
दूंगी।
यह कहकर उसने अपने सबसे छोटे लडके वासुदेव से
पूछा—क्यों रे ! भौजाई से शादी करेगा ?
वासुदेव की उम्र पांच
साल से अधिक न थी। अबकी उसका ब्याह होने वाला था। बातचीत हो चुकी थी। बोला—तब तो दूसरे के घर न जायगी न ?
मा—नही, जब तेरे साथ
ब्याह हो जायगी तो क्यों जायगी ?
वासुदेव-- तब मैं करूंगा
मां—अच्छा, उससे पूछ,
तुझसे ब्याह करेगी।
वासुदेव अनूप की गोद में जा बैठा और शरमाता
हुआ बोला—हमसे ब्याह करोगी ?
यह कह कर वह हंसने लगा; लेकिन अनूप की आंखें डबडबा गयीं,
वासुदेव को छाती से लगाते हुए बोली ---अम्मा, दिल से कहती हो ?
सास—भगवान् जानते है !
अनूपा—आज यह मेरे हो गये ?
सास—हां सारा गांव देख
रहा है ।
अनूपा—तो भैया से कहला
भैजो, घर जायें, मैं उनके साथ न जाऊंगी।
अनूपा को जीवन के लिए आधार की जरूरत थी। वह
आधार मिल गया। सेवा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ति है। सेवा ही उस के जीवन का आधार
है।
अनूपा ने वासुदेव को लालन-पोषण शुरू किया।
उबटन और तैल लगाती, दूध-रोटी मल-मल के खिलाती। आप तालाब नहाने जाती तो उसे भी
नहलाती। खेत में जाती तो उसे भी साथ ले जाती। थौडे की दिनों में उससे हिल-मिल गया
कि एक क्षण भी उसे न छोडता। मां को भूल गया। कुछ खाने को जी चाहता तो अनूपा से
मांगता, खेल में मार खाता तो रोता हुआ अनूपा के पास आता। अनूपा ही उसे सुलाती,
अनूपा ही जगाती, बीमार हो तो अनूपा ही गोद में लेकर बदलू वैध के घर जाती, और
दवायें पिलाती।
गांव के स्त्री-पुरूष उसकी यह प्रेम तपस्या
देखते और दांतो उंगली दबाते। पहले बिरले ही किसी को उस पर विश्वास था। लोग समझते
थे, साल-दो-साल में इसका जी ऊब जाएगा और किसी तरफ का रास्ता लेगी;
इस दुधमुंहे बालक के नाम कब तक बैठी रहेगी; लेकिन यह सारी आशंकाएं निमूर्ल निकलीं। अनूपा को किसी ने अपने व्रत से विचलित होते न
देखा। जिस ह्रदय मे सेवा को स्रोत बह रहा हो—स्वाधीन सेवा का—उसमें वासनाओं के लिए कहां स्थान ?
वासना का वार निर्मम, आशाहीन, आधारहीन प्राणियों पर ही होता है चोर की अंधेरे में
ही चलती है, उजाले में नही।
वासुदेव को भी कसरत का शोक था। उसकी शक्ल
सूरत मथुरा से मिलती-जुलती थी, डील-डौल भी वैसा ही था। उसने फिर अखाडा जगाया। और
उसकी बांसुरी की तानें फिर खेतों में गूजने लगीं।
इस भाँति १३ बरस गुजर गये। वासुदेव और अनूपा
में सगाई की तैयारी होने लगीं।
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द्वार पर नगाडा बज रहा था। बिरादरी के लोग
जमा थे। घर में गाना हो रहा था ! आज सगाई की तिथि थी
:
सहसा अनूपा ने जा कर सास से कहा—अम्मां मै तो लाज के मारे मरी जा रही
हूं।
सास ने भौंचक्की हो कर पूछा—क्यों बेटी, क्या है ?
अनूपा—मैं सगाई न करूंगी।
सास—कैसी बात करती है
बेटी ? सारी तैयारी हो गयी। लोग सुनेंगे तो क्या कहेगें ?
अनूपा—जो चाहे कहें, जिनके
नाम पर १४ वर्ष बैठी रही उसी के नाम पर अब भी बैठी रहूंगी। मैंने समझा था मरद के बिना औरत से रहा न जाता होगा। मेरी
तो भगवान ने इज्जत आबरू निबाह दी। जब नयी उम्र के दिन कट गये तो अब कौन चिन्ता है ! वासुदेव की सगाई कोई लडकी खोजकर कर दो।
जैसे अब तक उसे पाला, उसी तरह अब उसके बाल-बच्चों को पालूंगी।
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