तेंतर
आ
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पिता
का नाम था पंड़ित दामोदरदत्त। शिक्षित आदमी थे। शिक्षा-विभाग ही में नौकर भी थे; मगर इस संस्कार को कैसे मिटा देते, जो
परम्परा से हृदय में जमा हुआ था, कि तीसरे बेटे की पीठ पर होने वाली कन्या अभागिनी
होती है, या पिता को लेती है या पिता को, या अपने कों। उनकी वृद्धा माता लगी नवजात
कन्या को पानी पी-पी कर कोसने, कलमुंही है, कलमुही!
न जाने क्या करने आयी हैं यहां। किसी बांझ के घर जाती तो उसके दिन फिर जाते!
दामोदरदत्त
दिल में तो घबराये हुए थे, पर माता को समझाने लगे—अम्मा
तेंतर-बेंतर कुछ नहीं, भगवान् की इच्छा होती है, वही होता है। ईश्वर चाहेंगे तो सब
कुशल ही होगा; गानेवालियों को बुला
लो, नहीं लोग कहेंगे, तीन बेटे हुए तो कैसे फूली फिरती थीं, एक बेटी हो गयी तो घर
में कुहराम मच गया।
माता—अरे बेटा, तुम क्या जानो इन बातों को,
मेरे सिर तो बीत चुकी हैं, प्राण नहीं में समाया हुआ हैं तेंतर ही के जन्म से
तुम्हारे दादा का देहांत हुआ। तभी से तेंतर का नाम सुनते ही मेरा कलेजा कांप उठता
है।
दामोदर—इस कष्ट के निवारण का भी कोई उपाय होगा?
माता—उपाय बताने को तो बहुत हैं, पंडित जी से
पूछो तो कोई-न-कोई उपाय बता देंगे; पर इससे कुछ होता
नहीं। मैंने कौन-से अनुष्ठान नहीं किये, पर पंडित जी की तो मुट्ठियां गरम हुईं,
यहां जो सिर पर पड़ना था, वह पड़ ही गया। अब टके के पंडित रह गये हैं, जजमान मरे
या जिये उनकी बला से, उनकी दक्षिणा मिलनी चाहिए। (धीरे से) लकड़ी दुबली-पतली भी
नहीं है। तीनों लकड़ों से हृष्ट-पुष्ट है। बड़ी-बड़ी आंखे है, पतले-पतले लाल-लाल
ओंठ हैं, जैसे गुलाब की पत्ती। गोरा-चिट्टा रंग हैं, लम्बी-सी नाक। कलमुही नहलाते
समय रोयी भी नहीं, टुकुरटुकुर ताकती रही, यह सब लच्छन कुछ अच्छे थोड़े ही है।
दामोदरदत्त
के तीनों लड़के सांवले थे, कुछ विशेष रूपवान भी न थे। लड़की के रूप का बखान सुनकर
उनका चित्त कुछ प्रसन्न हुआ। बोले—अम्मा जी, तुम भगवान्
का नाम लेकर गानेवालियों को बुला भेजों, गाना-बजाना होने दो। भाग्य में जो कुछ
हैं, वह तो होगा ही।
माता-जी
तो हुलसता नहीं, करूं क्या?
दामोदर—गाना न होने से कष्ट का निवारण तो होगा
नहीं, कि हो जाएगा? अगर इतने सस्ते जान छूटे तो न कराओ गान।
माता—बुलाये लेती हूं बेटा, जो कुछ होना था
वह तो हो गया। इतने में दाई ने सौर में से पुकार कर कहा—बहूजी कहती हैं गानावाना कराने का काम
नहीं है।
माता—भला उनसे कहो चुप बैठी रहे, बाहर निकलकर
मनमानी करेंगी, बारह ही दिन हैं बहुत दिन नहीं है;
बहुत इतराती फिरती थी—यह न करूंगी, वह न
करूंगी, देवी क्या हैं, मरदों की बातें सुनकर वही रट लगाने लगी थीं, तो अब चुपके
से बैठती क्यो नहीं। मैं तो तेंतर को अशुभ नहीं मानतीं, और सब बातों में मेमों की
बराबरी करती हैं तो इस बात में भी करे।
यह
कहकर माता जी ने नाइन को भेजा कि जाकर गानेवालियों को बुला ला, पड़ोस में भी कहती
जाना।
सवेरा
होते ही बड़ा लड़का सो कर उठा और आंखे मलता हुआ जाकर दादी से पूछने लगा—बड़ी अम्मा, कल अम्मा को क्या हुआ?
माता—लड़की तो हुई है।
बालक
खुशी से उछलकर बोला—ओ-हो-हो पैजनियां
पहन-पहन कर छुन-छुन चलेगी, जरा मुझे दिखा दो दादी जी?
माता—अरे क्या सौर में जायगा, पागल हो गया है
क्या?
लड़के की उत्सुकता न
मानीं। सौर के द्वार पर जाकर खड़ा हो गया और बोला—अम्मा
जरा बच्ची को मुझे दिखा दो।
दाई
ने कहा—बच्ची अभी सोती है।
बालक—जरा दिखा दो, गोद में लेकर।
दाई
ने कन्या उसे दिखा दी तो वहां से दौड़ता हुआ अपने छोटे भाइयें के पास पहुंचा और
उन्हें जगा-जगा कर खुशखबरी सुनायी।
एक
बोला—नन्हीं-सी होगी।
बड़ा—बिलकुल नन्हीं सी! जैसी बड़ी गुड़िया! ऐसी गोरी है कि क्या किसी साहब की
लड़की होगी। यह लड़की मैं लूंगा।
सबसे
छोटा बोला—अमको बी दिका दो।
तीनों
मिलकर लड़की को देखने आये और वहां से बगलें बजाते उछलते-कूदते बाहर आये।
बड़ा—देखा कैसी है!
मंझला—कैसे आंखें बंद किये पड़ी थी।
छोटा—हमें हमें तो देना।
बड़ा—खूब द्वार पर बारात आयेगी, हाथी, घोड़े,
बाजे आतशबाजी। मंझला और छोटा ऐसे मग्न हो रहे थे मानो वह मनोहर दृश्य आंखो के
सामने है, उनके सरल नेत्र मनोल्लास से चमक रहे थे।
मंझला
बोला—फुलवारियां भी होंगी।
छोटा—अम बी पूल लेंगे!
छ
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तीन-चार
महीने हो गये। दामोदरदत्त रात को पानी पीने उठे तो देखा कि बालिका जाग रही है।
सामने ताख पर मीठे तेल का दीपक जल रहा था, लड़की टकटकी बांधे उसी दीपक की ओर देखती
थी, और अपना अंगूठा चूसने में मग्न थी। चुभ-चुभ की आवाज आ रही थी। उसका मुख
मुरझाया हुआ था, पर वह न रोती थी न हाथ-पैर फेंकती थी, बस अंगूठा पीने में ऐसी
मग्न थी मानों उसमें सुधा-रस भरा हुआ है। वह माता के स्तनों की ओर मुंह भी नहीं
फेरती थी, मानो उसका उन पर कोई अधिकार है नहीं, उसके लिए वहां कोई आशा नहीं। बाबू
साहब को उस पर दया आयी। इस बेचारी का मेरे घर जन्म लेने में क्या दोष है? मुझ पर
या इसकी माता पर कुछ भी पड़े, उसमें इसका क्या अपराध है? हम कितनी निर्दयता कर रहे
हैं कि कुछ कल्पित अनिष्ट के कारण इसका इतना तिरस्कार कर रहे है। मानों कि कुछ
अमंगल हो भी जाय तो क्या उसके भय से इसके प्राण ले लिये जायेंगे। अगर अपराधी है तो
मेरा प्रारब्ध है। इस नन्हें-से बच्चे के प्रति हमारी कठोरता क्या ईश्वर को अच्छी
लगती होगी? उन्होनें उसे गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमने लगे। लड़की को
कदाचित् पहली बार सच्चे स्नेह का ज्ञान हुआ। वह हाथ-पैर उछाल कर ‘गूं-गूं’
करने लगी और दीपक की ओर हाथ फैलाने लगी। उसे जीवन-ज्योति-सी मिल गयी।
प्रात:काल
दामोदरदत्त ने लड़की को गोद में उठा लिया और बाहर लाये। स्त्री ने बार-बार कहा—उसे पड़ी रहने दो। ऐसी कौन-सी बड़ी
सुन्दर है, अभागिन रात-दिन तो प्राण खाती रहती हैं, मर भी नहीं जाती कि जान छूट
जाय; किंतु दामोदरदत्त ने
न माना। उसे बाहर लाये और अपने बच्चों के साथ बैठकर खेलाने लगे। उनके मकान के
सामने थोड़ी-सी जमीन पड़ी हुई थी। पड़ोस के किसी आदमी की एकबकरी उसमें आकर चरा
करती थी। इस समय भी वह चर रही थी। बाबू साहब ने बड़े लड़के से कहा—सिद्धू जरा उस बकरी को पकड़ो, तो इसे
दूध पिलायें, शायद भूखी है बेचारी! देखो, तुम्हारी
नन्हीं-सी बहन है न? इसे रोज हवा में खेलाया करो।
सिद्धु
को दिल्लगी हाथ आयी। उसका छोटा भाई भी दौड़ा। दोनो ने घेर कर बकरी को पकड़ा और
उसका कान पकड़े हुए सामने लाये। पिता ने शिशु का मुंह बकरी थन में लगा दिया। लड़की
चुबलाने लगी और एक क्षण में दूध की धार उसके मुंह में जाने लगी, मानो टिमटिमाते
दीपक में तेल पड़ जाये। लड़की का मुंह खिल उठा। आज शायद पहली बार उसकी क्षुधा
तृप्त हुई थी। वह पिता की गोद में हुमक-हुमक कर खेलने लगी। लड़कों ने भी उसे खूब
नचाया-कुदाया।
उस
दिन से सिद्धु को मनोंरजन का एक नया विषय मिल गया। बालकों को बच्चों से बहुत प्रेम
होता है। अगर किसी घोंसनले में चिड़िया का बच्चा देख पायं तो बार-बार वहां
जायेंगे। देखेंगें कि माता बच्चे को कैसे दाना चुगाती है। बच्चा कैसे चोंच खोलता
हैं। कैसे दाना लेते समय परों को फड़फड़ाकर कर चें-चें करता है। आपस में बड़े
गम्भीर भाव से उसकी चरचा करेंगे, उपने अन्य
साथियों को ले जाकर उसे दिखायेंगे। सिद्धू ताक में लगा देता, कभी दिन में
दो-दो तीन-तीन बा पिलाता। बकरी को भूसी चोकर खिलाकार ऐसा परचा लिया कि वह स्वयं
चोकर के लोभ से चली आती और दूध देकर चली जाती। इस भांति कोई एक महीना गुजर गया,
लड़की हृष्ट-पुष्ट हो गयी, मुख पुष्प के समान विकसित हो गया। आंखें जग उठीं,
शिशुकाल की सरल आभा मन को हरने लगी।
माता
उसको देख-देख कर चकित होती थी। किसी से कुछ कह तो न सकती; पर दिल में आशंका होती थी कि अब वह
मरने की नहीं, हमीं लोगों के सिर जायेगी। कदाचित् ईश्वर इसकी रक्षा कर रहे हैं,
जभी तो दिन-दिन निखरती आती है, नहीं, अब तक ईश्वर के घर पहुंच गयी होती।
म
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‘अम्मा जी, ईश्वर जानते हैं जो मैं इसे
दूध पिलाती होऊं?’
‘अरे तो मैं मना थोड़े ही करती हूं, मुझे
क्या गरज पड़ी है कि मुफ्त में अपने ऊपर पाप लूं, कुछ मेरे सिर तो जायेगी नहीं।’
‘अब आपको विश्वास ही न आये तो क्या करें?’
‘मुझे पागल समझती हो, वह हवा पी-पी कर
ऐसी हो रही है?’
‘भगवान् जाने अम्मा, मुझे तो अचरज होता
है।’
बहू ने बहुत
निर्दोषिता जतायी; किंतु वृद्धा सास को
विश्वास न आया। उसने समझा, वह मेरी शंका को निर्मूल समझती है, मानों मुझे इस बच्ची
से कोई बैर है। उसके मन में यह भाव अंकुरित होने लगा कि इसे कुछ हो जोये तब यह
समझे कि मैं झूठ नहीं कहती थी। वह जिन प्राणियों को अपने प्राणों से भी अधिक समझती
थीं। उन्हीं लोगों की अमंगल कामना करने लगी, केवल इसलिए कि मेरी शंकाएं सत्य हा
जायं। वह यह तो नहीं चाहती थी कि कोई मर जाय; पर इतना अवश्य चाहती
थी कि किसी के बहाने से मैं चेता दूं कि देखा,
तुमने मेरा कहा न माना, यह उसी का फल है। उधर सास की ओर से ज्यो-ज्यों यह
द्वेष-भाव प्रकट होता था, बहू का कन्या के प्रति स्नेह बढ़ता था। ईश्वर से मनाती रहती
थी कि किसी भांति एक साल कुशल से कट जाता तो इनसे पूछती। कुछ लड़की का भोला-भाला
चेहरा, कुछ अपने पति का प्रेम-वात्सल्य देखकर भी उसे प्रोत्साहन मिलता था। विचित्र
दशा हो रही थी, न दिल खोलकर प्यार ही कर सकती थी, न सम्पूर्ण रीति से निर्दय होते
ही बनता था। न हंसते बनता था न रोते।
इस भांति दो महीने और
गुजर गये और कोई अनिष्ट न हुआ। तब तो वृद्धा सासव के पेट में चूहें दौड़ने लगे।
बहू को दो-चार दिन ज्वर भी नहीं जाता कि मेरी शंका की मर्यादा रह जाये। पुत्र भी
किसी दिन पैरगाड़ी पर से नहीं गिर पड़ता, न बहू के मैके ही से किसी के स्वर्गवास
की सुनावनी आती है। एक दिन दामोदरदत्त ने खुले तौर पर कह भी दिया कि अम्मा, यह सब
ढकोसला है, तेंतेर लड़कियां क्या दुनिया में होती ही नहीं, तो सब के सब मां-बाप मर
ही जाते है? अंत में उसने अपनी शंकाओं को यथार्थ सिद्ध करने की एक तरकीब सोच
निकाली। एक दिन दामोदरदत्त स्कूल से आये तो
देखा कि अम्मा जी खाट पर अचेत पड़ी हुई हैं, स्त्री अंगीठी में आग रखे उनकी छाती
सेंक रही हैं और कोठरी के द्वार और खिड़कियां बंद है। घबरा कर कहा—अम्मा जी, क्या दशा है?
स्त्री—दोपहर ही से कलेजे में एक शूल उठ रहा
है, बेचारी बहुत तड़फ रही है।
दामोदर—मैं
जाकर डॉक्टर साहब को बुला लाऊं न.? देर करने से शायद रोग बढ़ जाय। अम्मा जी, अम्मा
जी कैसी तबियत है?
माता
ने आंखे खोलीं और कराहते हुए बोली—बेटा तुम आ गये?
अब न बचूंगी, हाय भगवान्, अब न बचूंगी।
जैसे कोई कलेजे में बरछी चुभा रहा हो। ऐसी पीड़ा कभी न हुई थी। इतनी उम्र बीत गयी,
ऐसी पीड़ा कभी न हुई।
स्त्री—वह कलमुही छोकरी न जाने किस मनहूस घड़ी
में पैदा हुई।
सास—बेटा, सब भगवान करते है, यह बेचारी क्या
जाने! देखो मैं मर जाऊं तो
उसे कश्ट मत देना। अच्छा हुआ मेरे सिर आयीं किसी कके सिर तो जाती ही, मेरे ही सिर
सही। हाय भगवान, अब न बचूंगी।
दामोदर—जाकर डॉक्टर बुला लाऊं? अभ्भी लौटा आता
हूं।
माता जी को केवल अपनी
बात की मर्यादा निभानी थी, रूपये न खच्र कराने थे, बोली—नहीं बेटा, डॉक्टर के पास जाकर क्या
करोगे? अरे, वह कोई ईश्वर है। डॉक्टर के पास जाकर क्या करोगें? अरे, वह कोई ईश्वर
है। डॉक्टर अमृत पिला देगा, दस-बीस वह भी ले जायेगा!
डॉक्टर-वैद्य से कुछ न होगा। बेटा, तुम कपड़े उतारो, मेरे पास बैठकर भागवत पढ़ो।
अब न बचूंगी। अब न बचूंगी, हाय राम!
दामोदर—तेंतर बुरी चीज है। मैं समझता था कि
ढकोसला है।
स्त्री—इसी से मैं उसे कभी नहीं लगाती थी।
माता—बेटा, बच्चों को आराम से रखना, भगवान
तुम लोगों को सुखी रखें। अच्छा हुआ मेरे ही सिर गयी, तुम लोगों के सामने मेरा
परलोक हो जायेगा। कहीं किसी दूसरे के सिर जाती तो क्या होता राम! भगवान् ने मेरी विनती सुन ली। हाय! हाय!!
दामोदरदत्त को निश्चय
हो गया कि अब अम्मा न बचेंगी। बड़ा दु:ख हुआ। उनके मन की बात होती तो वह मां के
बदले तेंतर को न स्वीकार करते। जिस जननी ने जन्म दिया, नाना प्रकार के कष्ट झेलकर
उनका पालन-पोषण किया, अकाल वैधव्य को प्राप्त होकर भी उनकी शिक्षा का प्रबंध किया,
उसके सामने एक दुधमुहीं बच्ची का कया मूल्य था, जिसके हाथ का एक गिलास पानी भी वह
न जानते थे। शोकातुर हो कपड़े उतारे और मां के सिरहाने बैठकर भागवत की कथा सुनाने
लगे।
रात को बहू भोजन
बनाने चली तो सास से बोली—अम्मा जी, तुम्हारे
लिए थोड़ा सा साबूदाना छोड़ दूं?
माता ने व्यंग्य करके
कहा—बेटी, अन्य बिना न
मारो, भला साबूदाना मुझसे खया जायेगा; जाओं, थोड़ी पूरियां
छान लो। पड़े-पड़े जो कुछ इच्छा होगी, खा लूंगी,
कचौरियां भी बना लेना। मरती हूं तो भोजन को तरस-तरस क्यों मरूं। थोड़ी मलाई भी
मंगवा लेना, चौक की हो। फिर थोड़े खाने आऊंगी बेटी। थोड़े-से केले मंगवा लेना,
कलेजे के दर्द में केले खाने से आराम होता है।
भोजन
के समय पीड़ा शांत हो गयी; लेकिन आध घंटे बाद
फिर जोर से होने लगी। आधी रात के समय कहीं जाकर उनकी आंख लगी। एक सप्ताह तक उनकी
यही दशा रही, दिन-भर पड़ी कराहा करतीं बस भोजन के समय जरा वेदना कम हो जाती। दामोदरदत्त
सिरहाने बैठे पंखा झलते और मात़ृवियोग के आगत शोक से रोते। घर की महरी ने
मुहल्ले-भर में एक खबर फैला दी; पड़ोसिनें देखने
आयीं, तो सारा इलजाम बालिका के सिर गया।
एक
ने कहा—यह तो कहो बड़ी कुशल
हुई कि बुढ़िया के सिर गयी; नहीं तो तेंतर
मां-बाप दो में से एक को लेकर तभी शांत होती है। दैव न करे कि किसी के घर तेंतर का
जन्म हो।
दूसरी
बोली—मेरे तो तेंतर का नाम
सुनते ही रोयें खड़े हो जाते है। भगवान् बांझ रखे पर तेंतर का जन्म न दें।
एक
सप्ताह के बाद वृद्धा का कष्ट निवारण हुआ, मरने में कोई कसर न थी, वह तो कहों पुरूखाओं
का पुण्य-प्रताप था। ब्राह्मणों को गोदान दिया गया। दुर्गा-पाठ हुआ, तब कहीं जाके
संकट कटा।
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